बिहार की राजनीति इन दिनों बेहद गर्म है। भाजपा नेता और राज्य के उप-मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी तथा जन सुराज अभियान के संस्थापक प्रशांत किशोर (पीके) के बीच बयानबाजी का दौर तेज हो गया है। पीके ने दावा किया कि सम्राट चौधरी का 1995 से पहले Politics में कोई अस्तित्व नहीं था। इस पर उप-मुख्यमंत्री ने करारा जवाब देते हुए पीके की राजनीतिक समझ और अनुभव पर सवाल उठा दिए।
पीके का आरोप – “1995 से पहले राजनीति में नहीं थे सम्राट चौधरी”
प्रशांत किशोर ने एक बयान में कहा कि सम्राट चौधरी 1995 के बाद ही राजनीति में आए। उनका दावा था कि 1995 से पहले बिहार की राजनीति में उनका नाम और काम कहीं दर्ज नहीं था। यह बयान विपक्षी खेमे और पीके समर्थकों के बीच चर्चा का विषय बना।
सम्राट चौधरी का सीधा जवाब
सम्राट चौधरी ने इस आरोप पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि पीके को राजनीति का इतिहास और बिहार की सच्चाई की कोई जानकारी नहीं है। उन्होंने साफ कहा – “बिहार की राजनीति में हमारी जड़ें गहरी हैं और परिवार भी लंबे समय से राजनीति में सक्रिय रहा है।”
पारिवारिक राजनीतिक पृष्ठभूमि
सम्राट चौधरी ने याद दिलाया कि वे राजनीति में अचानक नहीं आए। उनके पिता और परिवार पहले से ही राजनीति में सक्रिय थे। इस आधार पर उन्होंने पीके के बयान को “तथ्यहीन और भ्रामक” बताया।
पीके की विश्वसनीयता पर सवाल
उप-मुख्यमंत्री ने कहा कि पीके खुद कभी चुनाव नहीं लड़े और न ही जनता से सीधा जुड़ाव रखा। ऐसे में उनके आरोपों का कोई मतलब नहीं बनता। सम्राट चौधरी ने तंज कसते हुए कहा कि “लोगों को केवल आंकड़ों और एजेंडे से नहीं, बल्कि जनता से जुड़कर राजनीति करनी चाहिए।”
1995 का संदर्भ क्यों महत्वपूर्ण है?
1995 बिहार विधानसभा चुनाव राज्य की राजनीति में टर्निंग पॉइंट माना जाता है। लालू प्रसाद यादव की सत्ता मजबूत हुई और विपक्ष में नई चुनौतियाँ पैदा हुईं। इसी समय सम्राट चौधरी के राजनीतिक करियर की चर्चा शुरू हुई। यही वजह है कि पीके ने इसे आधार बनाकर बयान दिया।
भाजपा का समर्थन और जवाबी हमला
भाजपा नेताओं ने भी सम्राट चौधरी का समर्थन किया। पार्टी नेताओं ने कहा कि पीके सिर्फ बयानबाजी करते हैं और जनता में उनकी पकड़ न के बराबर है। भाजपा ने इसे “जन सुराज अभियान की विफलता को छिपाने की कोशिश” करार दिया।
जनता के बीच कैसी प्रतिक्रिया?
इस विवाद पर जनता की राय बंटी हुई नजर आई। कुछ लोगों ने कहा कि पीके का बयान तथ्यात्मक हो सकता है, जबकि अधिकतर ने माना कि सम्राट चौधरी का राजनीतिक सफर वास्तविक और लंबे समय का है। सोशल मीडिया पर #SamratChoudhary और #PrashantKishor दोनों ही ट्रेंड करने लगे।
राजनीतिक रणनीति का हिस्सा
विशेषज्ञों का मानना है कि यह बयानबाजी 2025 बिहार चुनाव की तैयारियों का हिस्सा है। पीके खुद को जनता का नेता साबित करना चाहते हैं, जबकि सम्राट चौधरी भाजपा की ओर से मजबूत नेतृत्व प्रस्तुत करने की कोशिश कर रहे हैं।
भविष्य की राजनीति पर असर
सम्राट चौधरी और पीके के बीच यह जुबानी जंग आने वाले समय में और तेज हो सकती है। अगर यह विवाद लंबा खिंचता है तो बिहार की राजनीतिक बहस का बड़ा हिस्सा इन्हीं मुद्दों पर केंद्रित हो जाएगा। इससे गठबंधन समीकरण और चुनावी रणनीतियाँ भी प्रभावित होंगी।
निष्कर्ष – आरोप-प्रत्यारोप की राजनीति
कुल मिलाकर, यह विवाद बिहार की राजनीति में पुराने बनाम नए नेताओं की बहस को दर्शाता है। पीके अपने आप को एक विकल्प के रूप में पेश करना चाहते हैं, जबकि सम्राट चौधरी भाजपा की ओर से अपनी वैधता और मजबूती दिखा रहे हैं। इस बयानबाजी ने बिहार के सियासी माहौल को और गरमा दिया है।
अंतिम विचार
बिहार की राजनीति हमेशा से आरोप-प्रत्यारोप और व्यक्तिगत हमलों से भरी रही है। पीके और सम्राट चौधरी का यह विवाद भी उसी परंपरा का हिस्सा है। आने वाले चुनावों में यह देखना दिलचस्प होगा कि जनता किसकी बात पर भरोसा करती है – पुराने अनुभव वाले नेताओं पर या नए राजनीतिक चेहरों पर।





