बिहार लंबे समय से पलायन की समस्या से जूझ रहा है। हर साल लाखों युवा और श्रमिक राज्य छोड़कर दिल्ली, मुंबई, पंजाब, गुजरात और दक्षिण भारत जैसे इलाकों में रोज़गार की तलाश में जाते हैं। targets यह स्थिति केवल आर्थिक ही नहीं बल्कि सामाजिक और राजनीतिक रूप से भी बड़ा सवाल खड़ा करती है। इसी बीच राजनीतिक रणनीतिकार से नेता बने प्रशांत किशोर (PK) ने युवाओं को अपने मिशन “जन सुराज” से जोड़ने की कोशिश शुरू की है। आइए समझते हैं कि बिहार से पलायन क्यों बढ़ रहा है और PK युवाओं को किस तरह टार्गेट कर रहे हैं।
रोज़गार के अवसरों की भारी कमी
बिहार में औद्योगिक विकास लगभग ठप है। न तो बड़ी फैक्ट्रियाँ हैं और न ही सर्विस सेक्टर की बड़ी कंपनियाँ। छोटे स्तर पर कृषि आधारित काम होते हैं लेकिन उनमें भी युवाओं के लिए स्थायी अवसर नहीं बन पाते। यही कारण है कि रोज़गार की तलाश में युवा बाहर निकलने को मजबूर होते हैं।
कृषि पर अत्यधिक निर्भरता
राज्य की अधिकांश आबादी खेती पर निर्भर है। लेकिन खेती भी अब मुनाफ़े का सौदा नहीं रही। बंटवारे की वजह से ज़मीन के छोटे-छोटे टुकड़े हो गए हैं और उत्पादन लागत बढ़ गई है। ऐसे में युवाओं के लिए खेती आकर्षक विकल्प नहीं रह गया। यही कारण है कि वे पलायन को ही समाधान मानते हैं।
शिक्षा की गिरती गुणवत्ता
बिहार की शिक्षा व्यवस्था वर्षों से सवालों के घेरे में रही है। सरकारी स्कूलों और कॉलेजों में बुनियादी सुविधाओं की कमी है। क्वालिटी एजुकेशन पाने के लिए छात्रों को या तो पटना जैसे बड़े शहरों का रुख करना पड़ता है या राज्य से बाहर जाना पड़ता है। अच्छी शिक्षा न मिलने से रोजगार की संभावना भी कम हो जाती है।
बेरोज़गार युवाओं की बड़ी फौज
हर साल लाखों विद्यार्थी मैट्रिक, इंटर और ग्रेजुएशन पास करते हैं। लेकिन नौकरी के अवसर न होने के कारण ये सभी युवा बेरोज़गारों की सूची में शामिल हो जाते हैं। प्रतियोगी परीक्षाओं में सालों-साल तैयारी के बावजूद वैकेंसी बहुत कम निकलती हैं। इस इंतज़ार से तंग आकर अधिकांश लोग नौकरी की तलाश में पलायन कर जाते हैं।
बेहतर जीवन-स्तर की चाह
दिल्ली, मुंबई या बेंगलुरु जैसे शहरों में युवाओं को न केवल नौकरी मिलती है बल्कि बेहतर जीवन-स्तर और आधुनिक सुविधाएँ भी मिलती हैं। वहीं बिहार में आज भी स्वास्थ्य, शिक्षा, बिजली, सड़क और मनोरंजन जैसी सुविधाएँ सीमित हैं। बेहतर लाइफस्टाइल की चाह भी पलायन का एक अहम कारण है।
सरकारों की असफलता
पिछले कई दशकों से बिहार में अलग-अलग दलों की सरकारें रहीं, लेकिन किसी ने भी पलायन रोकने के लिए ठोस रणनीति नहीं बनाई। रोजगार सृजन, औद्योगिक निवेश और इंफ्रास्ट्रक्चर पर लंबे समय से गंभीर काम नहीं हो पाया। इस असफलता ने युवाओं को यह विश्वास दिला दिया है कि बाहर जाने पर ही उनकी ज़िंदगी बदल सकती है।
प्रशांत किशोर का “जन सुराज” मिशन
ऐसे माहौल में प्रशांत किशोर युवाओं को आकर्षित करने की कोशिश कर रहे हैं। वे गांव-गांव जाकर युवाओं से संवाद करते हैं और बताते हैं कि बिहार तभी बदलेगा जब यहां की राजनीति बदलेगी। PK का मानना है कि पलायन को रोकने का रास्ता केवल सत्ता परिवर्तन और बेहतर नीतियों से ही निकल सकता है।
युवाओं को नेतृत्व देने का वादा
प्रशांत किशोर युवाओं को यह संदेश देते हैं कि यदि वे चाहें तो बिहार की राजनीति को बदल सकते हैं। उनका फोकस युवाओं पर इसलिए है क्योंकि वही राज्य की सबसे बड़ी आबादी हैं और उनकी निराशा सबसे अधिक है। PK यह भरोसा दिलाने की कोशिश करते हैं कि आने वाले चुनावों में युवा ही नेतृत्व की भूमिका निभाएँगे।
रोजगार और विकास पर जोर
PK के भाषणों में रोजगार, शिक्षा और स्वास्थ्य हमेशा केंद्र में रहते हैं। वे कहते हैं कि जब तक बिहार में रोज़गार नहीं आएगा, पलायन नहीं रुकेगा। इसी वजह से वे युवाओं को यह सपना दिखा रहे हैं कि उनकी सरकार बनने पर राज्य में निवेश आएगा और बाहर जाने की मजबूरी खत्म होगी।
युवाओं की उम्मीदें और चुनौतियाँ
हालांकि युवाओं के सामने यह चुनौती भी है कि वे बार-बार नेताओं के वादों से निराश हो चुके हैं। लेकिन PK का अलग अंदाज़ और उनका “बाहरी इमेज” युवाओं को आकर्षित कर रहा है। अब देखना यह होगा कि वे इस उम्मीद को राजनीतिक सफलता में बदल पाते हैं या नहीं।
निष्कर्ष
बिहार से पलायन केवल आर्थिक नहीं बल्कि सामाजिक और राजनीतिक मुद्दा भी है। रोजगार, शिक्षा और बेहतर जीवन-स्तर की कमी ने युवाओं को राज्य से बाहर जाने पर मजबूर किया है। इस बीच प्रशांत किशोर युवाओं को यह विश्वास दिलाने की कोशिश कर रहे हैं कि बदलाव संभव है और वही इसके असली वाहक हो सकते हैं। आने वाले वर्षों में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या उनकी रणनीति बिहार की राजनीति और समाज में कोई वास्तविक बदलाव ला पाती है या यह केवल एक और अधूरी उम्मीद साबित होगी।
August 26, 2025