बिहार की राजनीति एक बार फिर बड़े राजनीतिक बदलाव की गवाह बनी, जब मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने एक भव्य समारोह में अपने मंत्रिपरिषद के साथ शपथ ली। इस समारोह में 27 मंत्रियों ने नीतीश कुमार के साथ शपथ ग्रहण किया। इस मौके पर प्रधानमंत्री PM Modi केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह, उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़, और आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू जैसे बड़े नेता मौजूद रहे। ऐसे आयोजन ने न केवल बिहार की सत्ता समीकरणों को फिर से मजबूत किया, बल्कि राजनीतिक संदेश भी स्पष्ट कर दिया कि केंद्र और राज्य के बीच तालमेल मजबूत रहेगा।
नीतीश कुमार ने फिर संभाली कमान
शपथ ग्रहण समारोह में सबसे ज्यादा नजरें नीतीश कुमार पर थीं, जिन्होंने एक बार फिर मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। पिछले कुछ वर्षों में उनके राजनीतिक निर्णय अक्सर सुर्खियों में रहे हैं – कभी भाजपा गठबंधन, कभी महागठबंधन और फिर वापसी। इस बार भी उन्होंने अपनी अगुवाई में सरकार बनाने की घोषणा करते हुए कहा कि उनका लक्ष्य बिहार के विकास को नई रफ्तार देना है।
सम्राट चौधरी बने डिप्टी सीएम
सम्राट चौधरी ने उपमुख्यमंत्री पद की शपथ ली। भाजपा की ओर से उनकी ताजपोशी बेहद महत्वपूर्ण मानी जा रही है, क्योंकि पार्टी उन्हें एक मजबूत OBC चेहरे के रूप में स्थापित करना चाहती है। यह पद उन्हें राजनीतिक केंद्र में तेजी से आगे बढ़ाने वाला हो सकता है।
विजय सिन्हा का कद हुआ और बड़ा
विजय सिन्हा को भी उपमुख्यमंत्री बनाया गया है। वे भाजपा संगठन में लगातार एक मजबूत और मुखर नेता के रूप में उभरते आए हैं। विधानसभा में उनकी नेता प्रतिपक्ष के रूप में भूमिका काफी मजबूत रही, और अब उपमुख्यमंत्री बनने से उनका कद और विस्तृत हो गया।
27 मंत्रियों ने ली शपथ– संतुलित टीम
नीतीश कुमार के साथ कुल 27 मंत्रियों ने पद और गोपनीयता की शपथ ली। मंत्रिपरिषद में जातीय और क्षेत्रीय संतुलन का विशेष ध्यान रखा गया है, ताकि प्रत्येक हिस्से से सरकार को राजनीतिक समर्थन मिलता रहे। मंत्रियों में अनुभवी और नए चेहरों दोनों का अच्छा मिश्रण देखने को मिला।
बड़े नेताओं की मौजूदगी ने बढ़ाया समारोह का महत्व
इस बार शपथ ग्रहण समारोह में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, अमित शाह, और चंद्रबाबू नायडू जैसे राष्ट्रीय स्तर के नेताओं की मौजूदगी ने राजनीतिक गर्मी बढ़ा दी। PM मोदी की उपस्थिति ने यह स्पष्ट संदेश दिया कि बिहार में भाजपा और जेडीयू का गठबंधन अब केंद्रीकृत समर्थन और साझा दिशा के साथ आगे बढ़ेगा।
विपक्ष पर भी बड़ा राजनीतिक संदेश
महागठबंधन या विपक्षी दलों के लिए यह शपथ समारोह किसी झटके से कम नहीं था। पिछले वर्षों में नीतीश कुमार के बदलते गठबंधनों ने विपक्षी दलों को लगातार असहज किया है। इस बार भाजपा के साथ मजबूत मंच पर खड़े होने से विपक्ष के लिए बिहार की राजनीति में चुनौती और बढ़ गई है।
बिहार के विकास पर फोकस – नीतीश का मुख्य एजेंडा
शपथ के तुरंत बाद नीतीश कुमार ने संकेत दिया कि उनकी सरकार का प्राथमिक एजेंडा विकास और जनकल्याण होगा। विशेष रूप से सड़क, शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और निवेश जैसे मुद्दों पर बड़े प्लान किए जाने की संभावना जताई गई। उनके बयान से साफ था कि बिहार को नई आर्थिक गति देने की कोशिश होगी।
केंद्र-राज्य सहयोग होगा और मजबूत
नीतीश कुमार का भाजपा गठबंधन में एक बार फिर शामिल होना, केंद्र और राज्य के बीच योजनाओं के तालमेल को बेहतर कर सकता है। प्रधानमंत्री मोदी और अमित शाह की मौजूदगी इस ओर संकेत देती है कि बिहार को आने वाले समय में बड़े प्रोजेक्ट, निवेश और विकास योजनाओं का लाभ मिल सकता है।
मंत्रियों में कई नए चेहरे – युवा नेतृत्व को भी मौका
27 मंत्रियों की सूची में कई नए नाम भी शामिल हैं। नीतीश कुमार और भाजपा ने युवा नेतृत्व को आगे बढ़ाने की कोशिश की है। यह संकेत हो सकता है कि आने वाले विधानसभा चुनावों तक गठबंधन नए चेहरों को स्थापित करने और व्यापक जनसमूह को साधने की रणनीति पर काम करेगा।
2025 चुनाव की तैयारी का मंच तैयार
विश्लेषक मान रहे हैं कि यह शपथ ग्रहण केवल सरकार गठन ही नहीं, बल्कि 2025 विधानसभा चुनाव की तैयारी का मंच भी है। भाजपा और जेडीयू एक साथ मजबूत रणनीति पर काम करते दिख रहे हैं। राष्ट्रीय नेताओं की उपस्थिति, बड़े राजनीतिक संदेश और नई टीम– सब मिलकर बताता है कि चुनावी युद्ध की शुरुआत हो चुकी है।
निष्कर्ष
शपथ ग्रहण समारोह ने यह साफ कर दिया कि बिहार की राजनीति एक नए दौर में प्रवेश कर चुकी है। नीतीश कुमार ने फिर से सत्ता संभाली है, लेकिन इस बार केंद्र के साथ मजबूत तालमेल और बड़े नेताओं का राजनीतिक समर्थन उनके पास है। सम्राट चौधरी और विजय सिन्हा जैसे नेताओं को बड़े पद दिए गए हैं, जो भाजपा की आगे बढ़ती भूमिका का संकेत है। मंत्रिमंडल में जातीय और क्षेत्रीय संतुलन के साथ युवा और अनुभवी चेहरों का मिश्रण बिहार की नई सरकार को गतिशील बना सकता है। अब देखने वाली बात होगी कि आने वाले महीनों में यह सरकार किस तरह बिहार के विकास और राजनीतिक रणनीति को दिशा देती है, क्योंकि 2025 चुनाव दूर नहीं – और राजनीतिक समीकरण लगातार बदलने वाली जमीन पर खड़े हैं।





