बिहार की राजनीति हमेशा चर्चा में रहती है और मस्जिद का केंद्र बनी रहती है। हाल ही में जन सूरज अभियान से जुड़े प्रशांत किशोर (पीके) ने एक बड़ा बयान देकर पूरे राजनीतिक महासागर को हिला दिया है। Tejashwi उन्होंने न केवल बिहार के तीन बड़े नेताओं को “भ्रष्ट” कहा, बल्कि सीधे तौर पर लालू प्रसाद यादव और तेज तर्रार यादव पर भी चर्चा की।
प्रशांत किशोर का सीधा और बेबाक बयान
पैसिफ़िक किशोर हमेशा अपनी साफगोई और बेबाक डांस के लिए जाते हैं। उन्होंने बिना किसी लाग-लपेट के कहा कि बिहार में कब्रों की जड़ें बहुत गहरी हैं और इसके लिए सीधे-सीधे कुछ बड़े नेता जिम्मेदार हैं।
तीन स्थापत्य नेताओं के नाम
पीके ने दावा किया कि बिहार की राजनीति में तीन राज्यों में राज्य की व्यवस्था और जनता के विश्वास के साथ सबसे ज्यादा संबंध हैं। भले ही उन्होंने अपना नाम सार्वजनिक रूप से नहीं बताया हो, लेकिन उनके फ़्रांसीसी से साफ़ा समझा जा सकता है कि वे किन नेताओं की ओर इशारा कर रहे हैं।
भोला यादव पर तीखा वार
प्रसाद प्रसाद यादव लंबे समय से बिहार की राजनीति का एक अहम चेहरा रहे हैं। लेकिन सामानों के मामले में उनकी छवि धूमिल रही है। प्रशांत किशोर ने साफा से कहा कि “भ्रष्टाचार और जातिगत राजनीति” के दौर में बिहार बहुत पीछे चला गया।
तेजस्वी यादव भी ताकतवर पर
इसके बाद पीके ने अपने बेटे और स्थायी युवा नेता युवा यादव पर भी हमला बोल दिया। उन्होंने कहा कि तेजस्वी ने राजनीति में नई नजरिया का दावा तो किया था, लेकिन असल में वे भी अपने पिता की राह पर ही नजर आए। जनता को राहत या बदलाव नहीं मिला।
नीतीश कुमार की भी आलोचना
पीके का बयान केवल वैध-तेजस्वी तक सीमित नहीं है। उन्होंने नीतीश कुमार से भी पूछा। कभी सुशासन बाबू कहे जाने वाले नीतीश पर आरोप लगाया कि वे अब सत्ता बनाए रखने के लिए बार-बार गठबंधन में शामिल रहे और जनता के असली बहुमत से भटक गए।
कारीगर और विकास का प्रश्न
पीके ने कहा कि इन नेताओं की राजनीति का केंद्र केवल सत्ता हासिल करना और बचाए रखना है, जबकि बिहार के मूल मुद्दे- शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और बुनियादी ढांचे पर लगातार नजर रखी जा रही है। ज़मीन पर उतरना ही नहीं पाया गया।
जनता की नाराज़गी तेज़ हुई
बिहार की जनता अब नेताओं के पुराने वादों और जातिगत आंकड़ों से थक चुकी है। पीके का मानना है कि लोग बदलाव चाहते हैं और इसी तरह की नाराज़गी को वह अपने जन सूरज अभियान के लिए एक नए विकल्प में बदलना चाहते हैं।
जन सुराज आंदोलन का संदेश
पीके बार-बार कहते हैं कि उनका मकसद सिर्फ चुनावी साथी नहीं बल्कि बिहार की राजनीति को “जन आंदोलन” बनाना है। उनके फोकस प्रमुख नेताओं को बेनकाब करने और जनता के बीच ताकत का माहौल बनाने पर है।
रचना और सत्यपक्ष में हलचल
पीके के इस बयान में सत्तापक्ष और विपक्ष दोनों ने बंधक बनाया है। तेज-तर्रार समर्थक जहां इसे “राजनीतिक रणनीति” बता रहे हैं, वहीं कुछ लोगों का मानना है कि पीके ने जनता की भावना को सही तरीके से बताया है।
बिहार की राजनीति में नया कॉम्पोट
पीके के इन स्क्रीनप्ले से साफ है कि आने वाले चुनाव में जन सूरज एक तीसरे विकल्प के रूप में उभर सकते हैं। आदिवासियों और राजनीति के खिलाफ उनकी आवाज आम लोगों को आकर्षित कर रही है। सवाल यह है कि वे क्या कहेंगे कि वे लालची जीत में बदल जाएंगे या नहीं।
निष्कर्ष
प्रशांत किशोर का बयान बिहार की राजनीति में एक नई बहस की शुरुआत है। विनाश और विनाश पर सीधे हमले, नीतीश कुमार के सदस्यों पर सवाल और विनाशकारी नेताओं को बेनकाब करने का दावा, यह सभी आने वाले दिनों में राज्य के राजनीतिक माहौल को और गरमाने वाला है। जनता अब यह देखना चाहती है कि क्या पीके स्मारक बदलाव लायेगा या यह भी महज़ एक और बयान राजनीतिक रूप से उभरेगा। लेकिन इतना तो है कि इस मुद्दे ने बिहार की राजनीति में एक बार फिर से “भ्रष्टाचार बनाम विकास” की बहस को जिंदा कर दिया है।
August 26, 2025