भारतीय राजनीति में आए दिन नए बयान और आरोप-प्रत्यारोप देखने को मिलते हैं। Chirag Paswan बिहार की राजनीति में इन दिनों एक नया मोड़ देखने को मिला है, जब लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) के नेता चिराग पासवान ने जन सुराज अभियान के संस्थापक और राजनीतिक रणनीतिकार प्रशांत किशोर (PK) पर बड़ा बयान दिया। चिराग का कहना है कि प्रशांत किशोर उसी तरह की राजनीति कर रहे हैं जैसी दिल्ली के मुख्यमंत्री और आम आदमी पार्टी (AAP) के नेता अरविंद केजरीवाल ने की थी। इस बयान ने बिहार की राजनीति में हलचल पैदा कर दी है।
चिराग पासवान का बयान क्यों सुर्खियों में?
चिराग पासवान ने खुले तौर पर कहा कि प्रशांत किशोर की राजनीतिक शैली और रणनीति ठीक उसी तरह की है जैसी कभी अरविंद केजरीवाल ने अपनाई थी। यह तुलना बिहार की राजनीति में इसलिए चर्चा का विषय बनी, क्योंकि केजरीवाल ने दिल्ली में एक नए राजनीतिक मॉडल के जरिए सत्ता पाई थी और अब PK उसी राह पर चलते दिख रहे हैं।
अरविंद केजरीवाल की राजनीति का अंदाज़
अरविंद केजरीवाल ने भ्रष्टाचार-विरोधी आंदोलन से राजनीति की शुरुआत की और “साफ राजनीति” और “जनता के हक़ की राजनीति” का नारा दिया। उनका मॉडल आम लोगों की समस्याओं पर सीधे फोकस करना था। चिराग के अनुसार, प्रशांत किशोर भी अब ग्रामीण इलाकों में जाकर जनता से सीधे संवाद कर रहे हैं और उनकी समस्याओं को चुनावी मुद्दा बना रहे हैं।
जन सुराज अभियान की रणनीति
प्रशांत किशोर ने जन सुराज अभियान की शुरुआत की है, जिसके तहत वे गांव-गांव जाकर लोगों से मिल रहे हैं और उनकी समस्याएं सुन रहे हैं। उनका कहना है कि राजनीति का केंद्रबिंदु जनता होनी चाहिए। चिराग पासवान का मानना है कि यह तरीका बिल्कुल वैसा ही है जैसा केजरीवाल ने “जनता दरबार” और मोहल्ला सभाओं से शुरू किया था।
चिराग पासवान की चिंता
चिराग पासवान ने यह बयान केवल तुलना करने के लिए नहीं दिया, बल्कि उनकी चिंता यह है कि PK की रणनीति बिहार के पारंपरिक राजनीतिक दलों के लिए चुनौती बन सकती है। जैसे दिल्ली में कांग्रेस और बीजेपी को AAP ने नुकसान पहुँचाया, वैसे ही बिहार में PK मौजूदा पार्टियों को कमजोर कर सकते हैं।
क्या PK नया राजनीतिक विकल्प बनेंगे?
बिहार में लंबे समय से नीतीश कुमार और लालू यादव जैसे नेताओं की पकड़ रही है। लेकिन अगर PK की रणनीति सफल होती है तो वे खुद को एक नए राजनीतिक विकल्प के रूप में पेश कर सकते हैं। चिराग का इशारा है कि PK धीरे-धीरे एक “थर्ड फ्रंट” तैयार करने की कोशिश कर रहे हैं।
केजरीवाल और PK में समानताएँ
- दोनों ने जनता से सीधे जुड़ने की रणनीति अपनाईदोनों “पारदर्शी राजनीति” की बात करते हैं।
- दोनों ही पारंपरिक दलों की आलोचना करके नया रास्ता दिखाने की कोशिश करते हैं।
- दोनों का जोर शिक्षा, स्वास्थ्य और बुनियादी सुविधाओं पर रहा है।
- यही कारण है कि चिराग पासवान ने PK को “केजरीवाल की कॉपी” कहने से परहेज़ नहीं किया।
राजनीतिक संदेश और टारगेट ऑडियंस
PK फिलहाल सीधे ग्रामीण और युवा वोटरों को टारगेट कर रहे हैं। बिहार में बड़ी संख्या में युवा हैं जो बदलाव चाहते हैं। चिराग पासवान मानते हैं कि PK की रणनीति अगर मजबूत हुई तो वे पारंपरिक वोट-बैंक राजनीति को तोड़ सकते हैं। यह स्थिति चिराग के लिए भी चुनौतीपूर्ण हो सकती है क्योंकि वे खुद भी युवा नेताओं में गिने जाते हैं।
बिहार के समीकरण पर असर
बिहार की राजनीति जातिगत समीकरणों और गठबंधनों पर चलती आई है। लेकिन PK का अंदाज़ अलग है। वे जाति से ऊपर उठकर मुद्दों की राजनीति करने की कोशिश कर रहे हैं। चिराग पासवान के बयान से यह साफ झलकता है कि उन्हें लगता है कि इस नए अंदाज़ से बिहार का राजनीतिक खेल बदल सकता है।
विपक्ष और जनता की प्रतिक्रिया
PK की बढ़ती सक्रियता और चिराग के बयान पर जनता भी ध्यान दे रही है। कुछ लोग मानते हैं कि बिहार को सच में एक नए राजनीतिक विकल्प की ज़रूरत है। वहीं दूसरी ओर, विरोधी दल PK को गंभीरता से नहीं ले रहे। लेकिन चिराग का बयान इस बात का संकेत है कि वे PK को अब एक संभावित प्रतिद्वंद्वी मानने लगे हैं।
आगे की राह – PK बनाम चिराग?
बिहार की राजनीति में आने वाले चुनाव बेहद दिलचस्प हो सकते हैं। चिराग पासवान खुद को “युवा चेहरा” और रामविलास पासवान की राजनीतिक विरासत के उत्तराधिकारी मानते हैं। वहीं PK राजनीति में एक “आउटसाइडर” हैं लेकिन उनके पास रणनीतिक अनुभव और जनसंपर्क की ताकत है। चिराग के बयान से यह साफ है कि दोनों के बीच अप्रत्यक्ष राजनीतिक टकराव की शुरुआत हो चुकी है।
निष्कर्ष
चिराग पासवान का यह कहना कि प्रशांत किशोर अरविंद केजरीवाल की तरह राजनीति कर रहे हैं, केवल एक तुलना नहीं बल्कि बिहार की बदलती राजनीति का संकेत भी है। यह बयान दर्शाता है कि PK की रणनीति धीरे-धीरे असर दिखा रही है और पारंपरिक दलों को चुनौती दे रही है। आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या प्रशांत किशोर सचमुच “बिहार के केजरीवाल” बन पाएंगे या यह केवल चर्चा तक सीमित रहेगा।





