Prashant Kishor एनडीए को ज्यादा नुकसान पहुंचाएंगे या महागठबंधन को?

By: Rebecca

On: Saturday, August 30, 2025 12:13 PM

Prashant Kishor एनडीए को ज्यादा नुकसान पहुंचाएंगे या महागठबंधन को?
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भारतीय राजनीति में जब भी चुनाव आते हैं, तो रणनीतिकारों और चुनावी चालबाज़ों का महत्व अचानक बढ़ जाता है। ऐसे में सबसे चर्चित नामों में से एक है प्रशांत किशोर (PK)। बिहार की राजनीति से लेकर राष्ट्रीय स्तर तक, उनकी भूमिका को हमेशा गेम-चेंजर माना गया है। अब बड़ा सवाल उठ रहा है – क्या प्रशांत किशोर एनडीए (राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन) को ज्यादा नुकसान पहुंचाएंगे या फिर महागठबंधन को?

प्रशांत किशोर का चुनावी इतिहास और पहचान

    प्रशांत किशोर की पहचान सिर्फ एक चुनावी रणनीतिकार के रूप में नहीं बल्कि एक मास्टरमाइंड के तौर पर है। चाहे नरेंद्र मोदी का 2014 का ऐतिहासिक लोकसभा चुनाव हो या ममता बनर्जी की 2021 की शानदार जीत – PK ने हर जगह अपनी छाप छोड़ी है। यही वजह है कि उनके कदम आज भी राजनीतिक दलों को असहज कर देते हैं।

    बिहार में PK की सक्रियता

      प्रशांत किशोर लंबे समय से बिहार पर फोकस कर रहे हैं। उनकी “जन सुराज यात्रा” और लगातार लोगों के बीच बने रहने की रणनीति उन्हें एक अलग स्तर पर ले जाती है। ऐसे में बिहार में मौजूद एनडीए और महागठबंधन दोनों को लगता है कि PK कहीं न कहीं उनकी वोट बैंक में सेंध लगा सकते हैं।

      एनडीए पर संभावित असर

        अगर PK की गतिविधियों को देखा जाए तो एनडीए के लिए चुनौती बड़ी हो सकती है। इसका कारण है कि PK खुद बीजेपी और जेडीयू के साथ पहले काम कर चुके हैं। उन्हें इनके अंदरूनी हालात और रणनीतियों की जानकारी है। अगर वे विपक्षी एजेंडा सेट करते हैं तो एनडीए की पारंपरिक बढ़त कमजोर हो सकती है।

        महागठबंधन की मुश्किलें

          महागठबंधन के लिए भी PK की मौजूदगी आसान नहीं है। राजद (RJD) और कांग्रेस जैसे दल पहले से ही संगठनात्मक संकट में हैं। PK की “न्यू एज पॉलिटिक्स” युवाओं को ज्यादा आकर्षित करती है। यह सीधा असर महागठबंधन के परंपरागत वोट बैंक पर पड़ सकता है।

          युवा और पहली बार वोटर पर पकड़

            PK की सबसे बड़ी ताकत है युवा और पहली बार वोट देने वाले। उनके अभियान हमेशा टेक्नोलॉजी, सोशल मीडिया और लोकल कनेक्ट पर आधारित होते हैं। यह वर्ग चाहे एनडीए का समर्थक हो या महागठबंधन का – अगर PK को पसंद करता है तो दोनों गठबंधनों को नुकसान तय है।

            तीसरा विकल्प बनने की संभावना

              बिहार की राजनीति दो ध्रुवों (एनडीए और महागठबंधन) पर टिके रहने के बावजूद तीसरे विकल्प की तलाश हमेशा रहती है। PK का मॉडल यही है कि वे खुद को इन दोनों के विकल्प के रूप में पेश करें। अगर वे थोड़े भी सफल हुए तो चुनावी समीकरण बदल सकते हैं।

              जातीय समीकरणों पर PK की नजर

                बिहार और उत्तर भारत की राजनीति जातीय समीकरणों के बिना अधूरी है। PK लगातार इस मुद्दे पर बात करते हैं कि राजनीति को जाति से आगे बढ़कर विकास केंद्रित होना चाहिए। अगर लोग इस विचार को स्वीकार करते हैं तो पारंपरिक जातिगत राजनीति (जिस पर एनडीए और महागठबंधन दोनों खड़े हैं) कमजोर हो सकती है।

                एनडीए और महागठबंधन – किसे ज्यादा खतरा?

                  अगर निष्पक्ष विश्लेषण किया जाए तो एनडीए को अपेक्षाकृत ज्यादा नुकसान हो सकता है। कारण ये है कि बीजेपी-जेडीयू के वोटर बेस में वे लोग भी शामिल हैं जो विकास और अच्छे प्रशासन की उम्मीद रखते हैं। PK का यही एजेंडा है। जबकि महागठबंधन का वोट बैंक जातीय और पारंपरिक झुकाव पर ज्यादा आधारित है।

                  PK की रणनीति – लंबी दौड़ का खेल

                    प्रशांत किशोर तुरंत चुनाव लड़ने की राजनीति नहीं कर रहे। वे जनता के बीच जाकर धीरे-धीरे भरोसा बनाने की कोशिश कर रहे हैं। यह रणनीति लंबी अवधि में दोनों गठबंधनों के लिए खतरनाक है क्योंकि जनता को सीधा विकल्प दिखने लगेगा।

                    2025 और 2029 के चुनावों पर नजर

                      वर्तमान में PK का प्रभाव तुरंत दिखे या न दिखे, लेकिन 2025 के बिहार विधानसभा चुनाव और 2029 के लोकसभा चुनाव में उनका रोल अहम रहेगा। तब यह स्पष्ट होगा कि किसे ज्यादा नुकसान हुआ – एनडीए या महागठबंधन।

                      निष्कर्ष

                      प्रशांत किशोर भारतीय राजनीति के ऐसे खिलाड़ी हैं जिनकी चालों का अंदाज़ा लगाना मुश्किल है। उनकी मौजूदगी से एनडीए और महागठबंधन दोनों असहज हैं। लेकिन अगर वोटर की पसंद और PK के काम करने के तरीके को देखा जाए तो एनडीए को उनसे ज्यादा नुकसान होने की संभावना है। वहीं, महागठबंधन भी पूरी तरह सुरक्षित नहीं है क्योंकि युवाओं और शहरी वोटरों पर PK की पकड़ दोनों गठबंधनों को नुकसान पहुंचा सकती है।

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